« »

टुकड़े जिगर के

1 vote, average: 3.00 out of 51 vote, average: 3.00 out of 51 vote, average: 3.00 out of 51 vote, average: 3.00 out of 51 vote, average: 3.00 out of 5
Loading...
Uncategorized

कैसे सुनाऊँ तुमको
बेआबरू कहानी
नस्तर जिगर को बेधती
अतीत की निशानी
पल भर में ही लो टूट गए
वर्षों के सपनें
टुकड़े किये इस जिगर का
टुकड़े जिगर के अपनें
खुशियों की ले उम्मीदें
दामन में हम चले थे
पर
लुट गए सरेराह चलते
बेबस हैं आज कितने
झोली है मेरी खाली
अश्क आँखों से अब नहीं गिरते
दिल की गहराइयों को
ये भिगोते हैं
अब तो रिसने लगे हैं
जख्म इतनें
लाइलाज बन गई है
मेरी ये जिंदगानी
स्वयं प्रभा

2 Comments

  1. Vishvnand says:

    अच्छी, दिल छूती और भावपूर्ण
    रचना मन भायी

  2. ASHOK GUPTA says:

    Thanks Prabha for reflecting the reality of every one’s life

    ASHOK GUPTA

Leave a Reply