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“दो अधिकार दिवाली मनाने का “

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Hindi Poetry

एक तंग गली  के  नुक्कड़ पर

बच्चों की टोली खेल रही मतवाली

नंगे पैर, फटे चीथड़े, चेहरों पर बदहाली

भूखे पेट, बरसों से प्यासे, कैसे मनाएं दिवाली?

उन्मुक्त मगन थे, खेल में वो ,

मस्तक चिंता की रेख नहीं

दो जून नहीं खा पाते थे

फिर भी ईश्वर से खेद नहीं

हे! सृष्टि के भाग्यविधाता

पल-छिन के निर्माता

इनके भी जीवन में रंग भर दो

बिन मांगे ही झोली भर दो

एक मौका तो इनको भी दो 

किस्मत पर इतराने का 

नहीं जले दीपक जिनके घर 

दो अधिकार दिवाली मनाने का 


10 Comments

  1. siddha Nath Singh says:

    sundar abhivyakti aur pravahpoorn shbdavali

  2. Vishvnand says:

    सुन्दर रचना, बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
    ईश्वर की यह है बहुत बड़ी गल्ती
    मानव को अन्य का अधिकार छीनने की दी जो घिनौनी प्रवृति

  3. Narayan Singh Chouhan says:

    sundar rachna

  4. rajivsrivastava says:

    aap ke rachna bade dino ke baad padne ko mili,ek bahut hi marmsparshi manbhavan rachna hai ye,aanad aa gaya–badahai

    • nitin_shukla14 says:

      @rajivsrivastava, हाँ राजीव कुछ दिन तन्हाईयों में निकल गए, और कुछ उनकी तलाश में…”
      पर इस मंच को कभी भी नहीं भूला
      रचना पढने और प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए हार्दिक धन्यवाद

  5. Harish Chandra Lohumi says:

    सशक्त रचना ! बधाई !

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