« »

निछावर जिनपे ये जानो जिगर हैं

0 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 5
Loading...
Hindi Poetry
निछावर जिनपे ये जानो जिगर हैं
खबर क्या थी कि इतने बेखबर हैं.
 
उन्हें मालूम क्या होगी हकीकत
मेरे ये क़हक़हे अश्कों से तर हैं.
 
जहाँ सैलाब ठाठें मारता है,
गरीबों के उसी खित्ते में घर हैं.    खित्ते-kshetra  
 
सुबह ने कर दिए बेनूर सारे,
दिए रोशन रहे जो रात भर हैं.
 
मरज़ के सामने लाचार कितने,
जिन्हें सब कह रहे थे चारागर हैं.    चारागर- चिकित्सक
 
मशीनें रह गयीं, इन्सां मरे हैं,
हुए आबाद ये जिनसे शहर हैं.
 
तरक्की के तराने गूंजते हैं,
जिन्हें सुन सुन डरे सहमे शजर हैं.   शजर-ped  ,तरु  
 
सलामत हौसला,क्यूँ हार मानो,
अदू तो सिर्फ पाए पर क़तर हैं.  अदू-शत्रु, प्रतिद्वंद्वी

2 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत खूब…

    महंगाई चीज़ क्या कैसे वो जाने
    सरकारी खर्च से जिनका बसर है ..

Leave a Reply