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बादल

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Aug 2011 Contest, Hindi Poetry

धूप छानते उमड़ रहे हैं ये जो बादल
आसमां पर काजल सा लगाते कभी
कभी सूरज का घूंघट बन जाते
इतराते हुए ये मंडराते
बड़ा नाज़ है इन्हें खुद पर
नीले आसमां को सफेदिया रंगते
और कभी सूरज से गुस्सा हो लाल पड़ जाते
सतरंगी इन्द्रधनुष का बसेरा हैं ये
मुट्ठी में लेना चाहो तो ख्वाब हो जाते
थामना मुमकिन नहीं इन्हें
ढेरों उम्मीदों का बोझ लिए
खुद को मिटाकर इन्हें
आखिर एक दिन बरसना भी तो है ..

One Comment

  1. s n singh says:

    madhur bhav liye sundar rachna.

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