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इस बज्मे निगाराँ में क्या क्या न गुज़र जाए.

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Hindi Poetry
इस बज्मे निगाराँ में क्या क्या न गुज़र जाए.   बज्मे निगाराँ-सौंदर्य की महफ़िल
सूरज भी परेशां है निकले तो किधर जाये.
 
अफ्लाक़ न बख्शेंगे  भूखे को कोई दाना,
अच्छा हो परिंदा ये धरती पे उतर जाये.
 
जो जो भी शनासा थे हैं शहर के शैदाई,   शनासा-परिचित,शैदाई-चाहनेवाले
क्या गाँव कोई लौटे, क्या सोच के घर जाये.
 
हर काम  हुआ करता सुनते हैं मशीनों से  
डरते हैं शहर जाते,अहसास न मर जाये.
 
आता है सनम मेरा, कह दीजे हवाओं से,
जुम्बिश तो दे शाखों को, कुछ फूल बिखर जाये.
 
अलफ़ाज़ हैं बेरौनक़,बेजान बयाँ मेरे,
कुछ जिक्र करूँ उसका, शायद कि संवर जाये.
 
इज्ज़त को हमेशा ही माना है अहम् हमने ,
दस्तार न गिरने दी ,जाता है जो सर जाये.   दस्तार-पगड़ी
 
साँसों की तपिश पाकर पत्थर हो अभी पानी,
है शर्त फ़क़त इतनी,वो प्यार तो कर जाये.
 
आओगे, न आओगे, अच्छा नहीं असमंजस ,
अहसान ये हो हम पर,एक बात ठहर जाये.
 
अंदाज़े बयाँ अपना ऐसा हो मेरे आक़ा,
निकले जो मेरे लब से, हर दिल में उतर जाये.   
 
उड़ते हो बुलंदी पर, इतना न गुरूर अच्छा,
तूफां  से ज़रा डरना, ये तोड़ न पर जाये.

3 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत अच्छे, और बढ़िया

    मुद्दत हुई है उनसे हम जो कभी मिल पाये
    अब याद भी आ जाती बस जख्म ही कर जाये

  2. shakeel says:

    वाह बहुत उम्दा ग़ज़ल भाई साहब वाकई रूह को सुकून मिला..

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