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ख्वाहिशें पतंगों जैसी

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Hindi Poetry
 कुछ ख्वाहिशें हैं,
 अरमानों जैसी,
 सांस ले रही हैं,
 बंद मुट्ठी में,
 उड़ना चाहती हैं खुली हवा में,
 जैसे पिंजरे से निकले हो पंछी,
 पर सिसकती हैं,
 क्यूंकि
 ख्वाहिशें पंछियों के पंख जैसी नहीं होती,
वो तो कटती हैं पतंगों की भांति,
अपनों से ही तो,
कभी हालात तो कभी जिम्मेदारी के मांजे से,
ख्वाहिशों के पंख हैं,
पर हाथ बंधे हैं…..
ऐसे में उन्हें सहेजने वाली मुट्ठी ही,
उनका गला न घोंट दे तो क्या करे…!!!!!!

One Comment

  1. siddha Nath Singh says:

    could not make out much. khvahish and arman are they not synonymn,panchhiyon ke pankh jaisi nahin balki patang jaisi katti hain magar pankh katen to bhi anjaam vahi hota hai,Got confuse by the metaphors !sorry.

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