« »

“जीवन-लीला”

0 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 5
Loading...
Hindi Poetry, Uncategorized
“जीवन-लीला”
==========
जीवन इक संघर्ष है, सुख-दुःख का है जाल,
पूर्व कर्म अनुसार ही, है वर्तमान की चाल !
भाँति-भाँति के जीव, भिन्न-भिन्न हैं रूप,
काला-गोरा-सांवला, कोइ रंक कोइ भूप !
सुबह शाम, दिन रात हैं, उष्ण-शर्द समभार,
अष्ट-याम की सारणी, करती इनका संचार !
सूर्यदेव है रचयिता, है वसुंधरा इनकी माता,
संचालक ईश्वर है जो कहलाता है विधाता !
ब्रह्मा की है सृष्टि यह, पोषक जिसका विष्णु,
शोषक है महेश्वर उसका जो होता असहिष्णु !
भारत ही इक भूमि है जहाँ हैं पुराण अरु वेद,
जिनसे मानव जानता, उचित-अनुचित का भेद,
जब तब भी वह चूकता, करने लगता है खेद !
धर्म-कर्म-सत्कर्म से, कर सकता दुख-विच्छेद,
मानव योनि वरदान है, सत्कर्मों का ही फल,
जिसका सदुपयोग कर, होते ही जाओ सफल !
पुनर्जन्म पर्यंत भी सत्कर्म का होगा प्रभाव,
मुक्तिमार्ग तक जाने हेतु ला सकता यह ठाव !
  ==========  

Leave a Reply