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“कमर तोड़ मंहगाई “

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Hindi Poetry
महंगाई ने बाजार में ऐसी आग लगाई,
दिन-दिन मजदूरी करके भी भर पेट रोटी न मिल पाई।
आम आदमी की कमर टूट गयी, कैसे हो भरपाई?
बर्तन-भांडे बेच-बेच कर पेट की आग बुझाई

बेगैरत ऐसी सरकार, इतनी बात समझ न आई,
खून-पसीना एक-एक कर जिसने फ़सल पर फ़सल उगाई,
ईंटे-पत्थर ढो-ढो कर बहुमंजलीय ईमारत बनायीं,
उसी कुशल परिवार को पेट भर रोटी न मिल पाई

यही हाल बना रहा तो वोह दिन भी अब दूर नहीं,
दाल-रोटी खाने वालों पर आयकर छापा मारा जायेगा,
अति विशिष्ट की श्रेणी में रखकर,
आयकर न भरने के आरोप में जेल भेजा जायेगा

ईंधन के दाम इतने बढेंगे विरले ही पा पायेंगे,
गाड़ी-घोड़ा साथ न देगा, हाँथ रिक्शा में बाहर जायेंगे
महिला सदस्यों को बैठाकर,
कुटुंब के पुरुष खींचते पाए जायेंगे

सब्जी और फलों की खुशबू लेने पर भुगतान करना होगा,
दूध, दही और घी का नयनों  से रसपान करना होगा
हर फल किलों या दर्जन में नहीं, ‘पर पीस’ बिकेंगे,
आलू, प्याज और टमाटर शोकेस में दिखेंगे

खिचड़ी को राष्ट्र भोजन का दर्जा मिल जायेगा,
पापड़,चटनी और अचार के साथ खाने वाला
करोड़पति की श्रेणी में रखा जायेगा,
आम आदमी की नज़रों में वह भ्रष्टाचारी कहलायेगा

सत्यनारायण की पूजा कर,
युगल शादी के बंधन में बंध जायेंगे
रिसेप्शन में परिवार के लोग,
मेहमानों में बूंदी का प्रसाद बटवाएंगे
मुंह दिखाई में दुल्हन की, शौक से बनठन आयेंगे,
कोई बादाम,कोई सेब , कोई प्याज-आलू,
अपनी-अपनी श्रद्धा से दे जायेंगे

शादी-शुदा दम्पति शादी की सालगिरह,
एक साल में नहीं एक दशक में मनाएंगे
सैर-सपाटे को पड़ोस की अनाज मंडी जायेंगे,
‘मन’ भर देखा हर अनाज को यह सोचकर खुश हो जायेंगे

मेवे और मिठाई सोनार बेचेंगे,
तस्वीर भी खींचने के पैसे लगेंगे
ह्रदय चिकित्सकों को अपना व्यवसाय बदलना होगा
उच्च रक्तचाप,मोटापे और ह्रदय रोग का एक भी मरीज न होगा

सोने-चांदी के आभूषण मिलीग्राम में बेचे जायेंगे,
स्टील में बनाकर सोना कहीं-कहीं चिपकायेंगे।
महिलाओं की लाली-लिपस्टिक भी इतनी महंगी हो जाएगी,
की पूरे मोहल्ले के बीच एक लिपस्टिक खरीदी जाएगी

ट्रेन की छतों पर यात्रा आधिकारिक घोषित होगी,
खुली हवा में सफ़र की बुकिंग विंडो अलग होगी
सफ़र करते वक्त हेलमेट पहनना अनिवार्य होगा,
जान-माल के नुकसान का रेलवे जिम्मेदार न होगा

मंहगाई के इस दौर में कंजूसी इतनी बढ़ जाएगी,
कि बेटा माँ से, माँ बेटे से अपना दर्द छुपाएगी 
उस पल की पीड़ा तो और भी बढ़ जाएगी,
जब घर की बेटी दहेज़ लेकर, ब्याह दी जाएगी

सरकारी तानाशाहों ने समाज बदल ही डाला है,
रूप बदल दिए,रंग बदल दिए,नोटों का बोलबाला है,
सोच हमारी धूमिल हो गयी, दिखता हर ओर घोटाला है,
यही नहीं कवि कल्पना में भी सब कुछ काला- काला है

 

4 Comments

  1. Vishvnand says:

    सुन्दर रचना बहु मन भायी
    हास्यरस सी लगे पर अंदाज़ गहन है भाई
    इस अलग सी अर्थपूर्ण रचना के लिए हार्दिक बधाई

    • ashwini kumar goswami says:

      @Vishvnand
      रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलियुग आएगा,
      हंस चुगेगा दाना-दुनका, कौआ मोती खाएगा !

      • ashwini kumar goswami says:

        @ashwini kumar goswami,
        नारी पहन सकेगी न लहँगा जो होगा तब इतना महँगा,
        आटा और नमक होगा दुर्लभ तो नारी दिखलाएगी ठेंगा !
        भोजन की मात्रा घटाकर केवल करना पड़ जाएगा भजन,
        सज्जन भूखे ही रहेंगे सारे जब जो कुछ हो खालेंगे दुर्जन !
        पाप करेंगी संतानें तो सजा हेतु पकड़े जाएंगे माँ-बाप,
        क्यों कि उन्हैं जन्म देना ही होगा इक सर्वमान्य श्राप !
        दूध, दही, घृत, चावल तथा मेवा-मिश्री आदि का स्वाद,
        भुला दिया जाएगा और बन जाएगा बस चौपाली संवाद !
        इनके नमूने देखने हेतु हमको जाना पड़ेगा अजायबघर,
        निर्वाह कठिन इतना होगा कि गिरवी रखना पड़ेगा घर !

  2. rajendra sharma'vivek' says:

    Nitin ji yah sach maniye jab mahangaai charam hogaa
    tab nahi hogi insaaniyat .jeevit nahi dharam hogaa
    daah sanskaar ke liye lakadi kande n mil paayege
    mahangaai se trast ho shmshaan ke murde bhi jalane ke saare hathkande apnaayege

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