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सपने.

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Dec 2011 Contest, Hindi Poetry

हकीकत से बहुत हैं दूर सपने

सभी को हैं यही मंज़ूर सपने.

 

जगा दें प्यार की सरगम सुहानी,

रगेजां में बजें संतूर सपने.   रगेजां-shira

 

बड़े दिलकश थे जब थे आप उनमे,

हुए अब किस क़दर बेनूर सपने.

 

हुईं हैं बेबसर कैसी वो आँखें,

जहाँ पर थे कभी भरपूर सपने.   बेबसर-जिनकी रौशनी चली गयी हो,

 

लगी है ठेस शायद ठोस सच की,

हुए जाते हैं सारे चूर सपने

 

उड़ीं नींदें है जिनकी आँख तक से,

वो देखें किस तरह मजबूर सपने.

6 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत खूब और बढ़िया

    हो जाए सार्थक जीवन जो देखे
    प्रभुप्रेम में डूबे हुए भरपूर सपने ….

  2. rajendra sharma "vivek" says:

    Hakikat har manjil hui mushkil
    Sahara hamako de rahe sapane

  3. sonal goswami says:

    it is really beautiful..

  4. Narayan Singh Chouhan says:

    सुन्दर सपने ……..

  5. Reetesh Sabr says:

    उड़ीं नींदें है जिनकी आँख तक से,
    वो देखें किस तरह मजबूर सपने.

    हासिल ए ग़ज़ल शेर!

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