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“ठिठुरन”

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Hindi Poetry

“ठिठुरन”
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ठिठुर रहे दिन-रात सभी हम शर्दी से,

चाहे ढ़के हुए हैं मोटी सी ऊनी वर्दी से !

जो भी आ-जा रहे ठिठुरते रास्ते में,

चाय संग खारहे चाट-पकोड़े नास्ते में !

गोल-गप्पे, छौले-बटूरे बेचते जो हरजाई,

बेच-बाच कर लौटते ही ओढ़ लेते रजाई !

मानव तो जैसे तैसे कर ही लेता है बचाव,

हैवानों को ठिठुरना पड़ता बिना ठौर-ठाव !

हज़ारों पक्षी ठिठुरते-गिरते-पड़ते निरंतर मरते,

इसी भाँति हज़ारों दीन-हीन बन्दे ठण्ड से मरते !

इसीलिए सर्वश्रेष्ट कहलाती है मानव यौनी,

जो ही कभी कर सकती अनहोनी को होनी !

मानव-जन्म होता है सत्कर्मों का ही वरदान,

कर्मानुसार ही जन्म देने का है विधि का विधान !
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