« »

“विधि का विधान”

1 vote, average: 4.00 out of 51 vote, average: 4.00 out of 51 vote, average: 4.00 out of 51 vote, average: 4.00 out of 51 vote, average: 4.00 out of 5
Loading...
Hindi Poetry

“विधि का विधान”

============
आता नहीं है वो किसी को कहने कि उसे पूजो,
यह भी नहीं कहता कि वो करता है चाहता जो !
हर प्राणी जैसा वो भी है सदा प्रकृति के अधीन,
विलक्षण ध्यान-शक्ति ने किया उसे स्वाधीन !
कर्मचक्र का आविष्कारक है वो जिसे कहते ईश्वर,
जिसका सर्वप्रथम स्वरूप कहलाता अर्धनारीश्वर !
हर दृश्य-अदृश्य स्थिति के होते तीन मूल स्वरूप,
आरम्भ, मध्य अरु अंत जिन्हें कह सकते हैं बेटूक !
होता है त्रिगुणात्मक ही चाहे प्राणी हो या पदार्थ,
मूल सिद्धांत होते जिनके स्वार्थ-निस्वार्थ-परमार्थ !
यथा —–
शीत-उष्ण-शीतोष्ण, शेत-श्याम-श्यामल,
जल-नभ-थल और ठोस-वातज-तरल !
महालक्ष्मी, महाकाली अरु महासरस्वती,
ब्रह्मा, विष्णु, महेश, लक्ष्मी, पार्वती, सरस्वती !
इसी भाँति प्राणी-पदार्थ के होते तीन मूल उद्भाव,
जैसे व्यावहारिकता में दुर्भाव-समभाव-सद्भाव !
जलचर-थलचर-नभचर तीन श्रेणी के हैं प्राणी,
जिनके कंठ से होती है श्रव्य श्रवणप्रिय वाणी !
मानव ही मात्र कर सकते वेद-शास्त्र का ज्ञान,
तदनुसार ही वे करते हैं पूजा-पाठ अरु ध्यान !
कर्मचक्र में समाविष्ट है फल-निष्फल का बोध,
इसीलिए ज्ञानी-ध्यानी करते पूजा का अनुरोध !
जैसा कर्म करोगे वैसा ही सदा पाओगे प्रतिफल,
दुष्कर्मों से परहेज करो तो ही जीवन होगा सफल !
                =============       

2 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत प्रशंसनीय यह रचना और ज्ञानार्जन
    आपका यह सबके लिए प्रयास और सुलभ वर्णन

    Commends

Leave a Reply