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जो हमको बात उनसे पूछनी थी,वही शामिल नहीं थी सूचना में.

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गुज़रते  बादलों को कौन थामे.
घिरे, बरसे, उड़े वापस हवा में.
 
सुकूं की नींद मुमकिन भी कहाँ थी,
हमेशा ही रहे हम इम्तिहाँ में.
 
न तिनका तक मिला है डूबतों को,
लगाये सब गए उस आशियाँ में.
 
रहा आगाज़ तो बोझल दुखों से,
मिलेगा क्या कभी सुख इंतिहा  में.
 
मिटी कुछ मुल्क से बेशक गरीबी,
हुए खुश हाल चाचे और मामे.
 
गए शाही शबिस्तां में सभी गुल,
फिरे बेचैन बुलबुल गुलसितां में.
 
मिली है ज़िन्दगी जैसे सफ़र हो-
अँधेरी अंतहीना कन्दरा में.
 
यहाँ तो बज़्म में सक़ता खिचा है,
गुजारेंगे कहीं वो और  शामे.
 
समाअत सिर्फ काले कोट की थी,
गए थे हम  अदालत आलिया में.
 
जो हमको बात उनसे पूछनी थी,
वही शामिल नहीं थी सूचना में.
 
निकम्मे काम का एजाज़ भोगें,
बड़ा दम था खुशामद की जुबां में. 
 

4 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत बढ़िया

    “जो हमको बात उनसे पूछनी थी,
    वही शामिल नहीं थी सूचना में”.

    बड़ी तरकीब से गाडा जिसे था
    उसीका भूत उभरा है समा में

  2. Digvijay gupta says:

    sir ,
    आपने एक शेर बहुत पहले सुनाया था , आपको पुनः समर्पित है ,
    ‘” वो बात कि जिसका जिक्र पूरे फ़साने में न था ,
    वो बात उनको बहुत नागवार गुजाई है . “

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