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सुकून…तेरी चाह

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Hindi Poetry

यहाँ-वहां, सब जगह
हाथ मार-मार थक गयी हूँ
तुझे कितना तलाशा
अब बहुत उदास सी हो गयी हूँ
तू दिखता तो है, पर
बहुत दूर
पास आने को बेताब हो रही हूँ
सीढ़ी चढ़ बादलों तक भी
तुझे पकड़ने का साहस कर रही हूँ
पर
हवा के झोंके की तरह
हाथों में रुकता ही नहीं तू
इक मछली की तरह, झट
समुद्र की गहराइयों में खो जाता है तू
उछाल मारती लहरों में
कभी दिखता, कभी खो जाता है तू
क्या करूँ
कैसे पाऊँ तुझे
किससे रास्ता पूछूं
कैसे अपनाऊँ तुझे?
तू तकता तो है न कभी मेरी और?
तुझे मालूम है न मन व्याकुल घोर?
देख, कितनी बेचैनी से गले लगाने को व्यग्र
और इम्तिहान न ले पास आ भी जा तुरंत
अब भर भी ले बाहों में मुझे, ऐ छली सुकून
ऐसे समा ह्रदय में कभी न हों दूर
कुछ ऐसे मिलें
इक दूजे के बीच
पहचान एक, चेहरा एक,
एक हो जाए दोनों के भेष|

9 Comments

  1. Vishvnand says:

    अति सुन्दर रचना और ढूंढ
    अंतर्मन का नाद और mood
    बहुत मनभावन
    Kudos

    भगवन सा ही है ये सुकून
    रहे पास पर लगता दूर
    जीवन भर हम रहते ढूँढ़
    मिले कभी फिर जाता छूट
    अहसास का ये खेल जरूर …

    • parminder says:

      @Vishvnand, Thank you Vishva ji. हमेशा की तरह, आप सही हैं, है तो सब मन में, हमें ही नहीं दिखता |

  2. siddha nath singh says:

    personification ka jeeta jagta udaharan,dhanya ho.

  3. Hi Parminder,
    Very heartwarming , simple words with profound depth .Enjoyed these lines very much . They sum up the poem .
    ‘अब भर भी ले बाहों में मुझे, ऐ छली सुकून
    ऐसे समा ह्रदय में कभी न हों दूर
    कुछ ऐसे मिलें
    इक दूजे के बीच
    पहचान एक, चेहरा एक,
    एक हो जाए दोनों के भेष|
    regards
    Sarala.

  4. Aditya ! says:

    बहुत ही बढ़िया इस कृति के लिए बधाई.

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