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ट्रेन का सफ़र

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Anthology 2013 Entries, Hindi Poetry

याद है
जब तुम छोटे थे
ट्रेन में सफ़र करने का शौक बस शुरू ही हुआ था
कैसे विंडो सीट के लिए झटपट भागते थे
ट्रेन स्टेशन छोडती, स्पीड पकड़ती
और तुम्हारी नज़रें जमी जाती खिड़की से बाहर
पहले प्लॅटफॉर्म गुज़रता, फिर शहर
दूर तक निगाहों में तेज़ हवा और खेत के खेत समाते जाते
कभी जंगल आता, कभी छुट पुट कोई स्टेशन
तुम बाहर ही देखते रहते
खिड़की के बाहर की दुनिया पीछे भागती हुई मालूम पड़ती
होड़ ही होड़ में पेड़, सर पर पैर रख दौड़ लगाते
स्कूल बस के लिए जैसे सुबह भागते थे तुम
और पीछे से माँ टिफिन लिए दौड़ी चली आती थी
वैसे ही कुछ इधर पेड़ों के पीछे से पहाड़ दौड़े आते
मानो कह रहे हों, “अरे रुक बेटा लंच-बॉक्स तो लेता जा!”
कभी कभार अलसाए-अजगर सी नदी आती, लेकिन वो भी सरकती जाती
और खेत, खेतों में स्प्रिंक्लर, स्प्रिंक्लर से फुदकती पानी की फुहार
उन के बीच में हरी फसल से लंबी ऊगी एक झोपड़ी भी
सबके साथ भागती जाती
तुम्हारी नज़रें उसपर टिकी रहतीं, जब तक वो ओझल ना हो जाती
कुछ मंज़र छूटते, तो कुछ नये और आँखों में आते
पर रुकते नहीं, हमेशा चलते जाते, फिसलते जाते
और फिर..
तुम्हारा स्टेशन आ जाता
तुम्हे लगता कि सब कुछ कितनी जल्दी गुज़र गया
झोपड़ी, शीशम-नीम-आम के पेड़, नदियाँ, खेत, पहाड़, स्प्रिंकलर्स और वो वक़्त
सब कितने जल्दी कहाँ चले गये पता ही नहीं चला
लेकिन अभी तुम्हारी मासूम साँसों को अंदाज़ा नहीं है
कि वो कहीं नहीं गये, वहीं हैं..
बस तुम ज़रा आगे निकल आए हो..

6 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
    रचना अर्थपूर्ण बहुत मनभायी

    जैसे जीवन है train का सफ़र
    हम सब पीछे छोड़ते चले जाते है
    आगे अपने stations आते रहते हैं
    पीछे छूटी यादों को नहीं भूल पाते हैं

  2. s.n.singh says:

    kitni saadgi se kitni gahri baat kah dee, subhaan allah.sadqe jaaoon.

  3. U.M.Sahai says:

    बहुत सुंदर चित्रण, मज़ा आ गया, बधाई, आदित्य.

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