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बहती नदिया

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Hindi Poetry

दौड़ते-दौड़ते बीती जी रही ज़िंदगी
कहीं कोई विराम, कोई पड़ाव नज़र नहीं आता
एक के बाद एक उलझनें हैं घेरती जा रहीं
बचने का जिनसे कोई मार्ग नहीं दिखता|

ज़िंदगी है जैसे एक बहती नदिया
हर कंडा, हर किनारा
साथ है लगा हुआ
पर साथ कहाँ, सब पीछे छूटता ही गया|

नाम दिए कुछ रिश्तों के
कुछ दूर और कुछ पास के
रुका कोई क्या पास हमारे?
बहती नदिया से बह ही गए|

दिलो-दिमाग में छाई है कुछ सपनों की तस्वीर
हाथ-पाँव यहाँ-वहां हैं टटोलते से
है प्रयत्न समस्त, हो उनकी ताबीर
न बहें उस नदिया से, लगे रहें साथ कंडों से |

6 Comments

  1. Vishvnand says:

    अति सुन्दर अभिव्यक्ति
    ह्रदयस्पर्शी, मार्मिक सच समझाती
    सबकुछ हाथ में आकर छूटती हुई सी …

    बहुत सुन्दर मनभावन रचना
    commends

  2. Kusum Gokarn says:

    Parminderji,
    Fine expression.
    It is the nature of river to flow on and on forwards, never backwards until it joins the ocean of eternal bliss.
    That applies to human relationships too.
    Kusum

  3. PRAVEEN GUPTA says:

    very true…

  4. Siddha Nath Singh says:

    vichitra baat ye hai ki bahti nadi me machhli apne ande dene ke liye dhara ke vipreet upstream kee or gaman karti hai. jeevan ka nairantarya isi ulti dhar me chalne se banta hai.

  5. Aditya ! says:

    “नाम दिए कुछ रिश्तों के
    कुछ दूर और कुछ पास के
    रुका कोई क्या पास हमारे?
    बहती नदिया से बह ही गए|”

    वाह.

  6. parminder says:

    आप सब का हार्दिक धन्यवाद एवं अभिनन्दन!

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