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याद है?

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याद है जब हम बसंत मेले में झूले पर बैठे थे ?
बार बार बैठे थे
पेट में गुदगुदी और हंसी रुकती ही नहीं थी
झुलेवाले ने बोला ….बस रात बहुत हो चुकी….और हम हँसते हँसते घर गए
आज एक बिखरा हुआ झूला देखा
गुदगुदी तो नही हुई
ऐसा लगा डूब रही हूँ
और कोई बचाने वाला नही

5 Comments

  1. Harish Chandra Lohumi says:

    अच्छे भाव.
    वो बसंत के झूले और ये बरसाती झूले.

  2. Vishvnand says:

    वाह वाह कितनी सुन्दर चित्रित अभिव्यक्ति
    इसके लिए दिल से बधाई
    commends

  3. yugal gajendra says:

    एक बेहतर कविता.

  4. U.M.Sahai says:

    अच्छी कविता, बधाई.

  5. Prem Kumar Shriwastav says:

    वाह…

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