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सुकून….

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है इस शहर में भी धूप,कही छाव ,कही बारिस ,
पर नहीं वो सुकून, जो मेरे गाव में मिलता है,
आज बड़े दिनों बाद फिर से जाना है वहा,
जहाँ हर सुबह के साथ कमल का फूल खिलता है…

3 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत खूब

    नही आता समझ मेरे सुकूँ क्या ऐसी बला है
    जहां वो है वहां न रह सकें औ रहते जहां ना है

  2. praveen gupta says:

    बेहतरीन …….:):)…”गर यही समझ जाते की सुकून क्या है, तो हम उनके न होते और वो हमारे न होते…”

    • Vishvnand says:

      @praveen gupta ,
      शुक्रिया
      जब वो बिलकुल करीब हैं तो लगता बड़ा सुकूँ है और शायद नहीं भी
      और जब वो पास नही दूर हैं तो लगता सुकूँ खो गया है और साथ है भी 🙂

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