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फूल? शूल?

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Hindi Poetry

चुनते चुनते फूल बेहतरीन और बहुत ख़ास
बागों की रौनक संगठित की अपने आस-पास
खुशबू को बाँध संकुचित किया
बिखरने न दिया किंचित मात्र भी कहीं आस-पास|

पुरजोर भभकों से नासें हैं भन्नाईं
आईं न वोह किसी को रास, न मन भाईं,
पर धीमें-धीमें धमनिओं में लगीं दौड़नें
मुस्कुराहटें हर तरफ दीं दिखाई|

चुनते-चुनते उंगलियाँ भरी ज़ख्मों से
भांपा न था हर फूल है बंधा किसी शूल से
मैं तो मखमली ख़ूबसूरती से खिंचता गया
कटीले आभासों की अवहेलना करता चला गया|

बगिया खिली
मन प्रफुल्लित
चुभन काटों की
तुच्छ, उपेक्षित!

शनैः शनैः हर ह्रदय में स्वीकृत
काँटों का हर पैना वार विस्तृत!

4 Comments

  1. rajendra sharma "vivek" says:

    Gaharo bhaavo ke liye kavita
    parmindar ji badhaai

  2. Vishvnand says:

    वाह वाह कैसा ख़याल कैसी कल्पना
    उभरी और लिखी गयी ये अनन्य खूबसूरत रचना
    बहुत मन भायी कह व्यक्त नही होता जो चाहूँ कहना

    अर्थपूर्ण गहन रचना के लिए हार्दिक अभिवादन
    Stars 5+

    • parminder says:

      @Vishvnand, आपकी सराहना, हौंसला-अफजाई, बहुत हिम्मत प्रदान कर गयीं, बहुत-बहुत धन्यवाद!

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