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मैंने सपने लेना छोड़ दिया है.

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मैंने सपने लेना छोड़ दिया है.

मन मंदिर की दीवारों पर, कितने मकड़ी के जाले थे.
थे तृष्णा से बढ़ते रहते,सालों मैनें संभाले थे.
खूब सजाया बड़े चाव से, उपवन से फूलों को चुनकर.
खुशियों के ताने में बुनकर, दुनिया भर के ताने सुनकर.
आंख उठाकर हाथ बढाकर
मैंने वही घरोंदा तोड़ दिया है.
मैंने सपने लेना छोड़ दिया है.

सतरंगी रंग भरे मैंने,जाने कितनी ही कसमों से,
कदम मिलाकर चलना चाहा,जाने कितनी ही रस्मों से,
छालित दंभ ले अंतर्मन में,चार कदम बस साथ मिलाकर,
एक नया सा ख्वाब दिखाकर,खुद ही उसमें आग लगाकर,
तुम पश्चिम को जाते हो तो.
मैंने पूरव को मुंह मोड़ लिया है.
मैंने सपने लेना छोड़ दिया है.

उड़ते बादल के संग उड़े, कितने यादों के गीत मिले.
चपल चांदनी चित में चमकी,पलकों पर भी मधुमास खिले,
शीतल सांसे जेठ मास में,भावों की गर्मीं भादों में.
ऑंखें भी कितनी बरसी थी ,जब बादल छाये यादों में.
था भरा जिसे जगरातों से,
मैंने वो गागर को फोड़ दिया है.
मैंने सपने लेना छोड़ दिया है.

धरती को तो चाहे चंदा,पर उसको वो कब मिल पाती.
वो तो चाहे सूरज साथी,सदियों से फिरती बलखाती.
भंवरा चंदा या चातक हो,या लौ पर मिटता परवाना,
युगों युगों का ये अफसाना,सुनते आये हमने जाना.
दुनिया के बस इसी गणित में ,
एक सबक अपना भी जोड़ दिया है.
मैंने सपने लेना छोड़ दिया है.

– मनोज भारत

6 Comments

  1. parminder says:

    बहुत-बहुत सुन्दर रचना! पर निराशा से भरी है|
    बिन आस क्या जीवन है? जब हर सांस नए पल का दे संदेशा , तो दुःख भी तो बीत जाना है!

    • Dr. Manoj Bharat says:

      @parminder,
      इसका दूसरा पक्ष भी कुछ यूँ हो सकता है. मेरी एक पूर्ववर्ती रचना में झांक के देखे.—-

      आओ सपने बुन लेते हैं !
      कंटकमय हैं जीवन राहें, कुछ फूलों को चुन लेते हैं !

      मैं तेरा राजा बन जाऊँ , तुमको प्यारी रानी कह दूँ .
      प्रेमनगर का गाँव सलोना , अपनी नई कहानी कह दूँ.
      देख पवन से शब्द चुराकर,मैं भी तो कुछ गा सकता हूँ.
      कोयल की मीठी बोली से , इन गीतों की धुन लेते हैं !
      आओ सपने बुन लेते हैं !

      चारों तरफ है अँधियारा , फैली है घनघोर उदासी.
      राहें तक तक पड़ी अकेली,बुझती जाती अँखियाँ प्यासी,
      देख उधर तू इसी गगन में,चाँद अभी भी मुस्काता है,
      पहले ही हैं जग में ज्यादा ,क्यों इतने तम गुण लेते हैं !
      आओ सपने बुन लेते हैं !

  2. Vishvnand says:

    सुन्दर रचना और अलग सी सपनों पर अभिव्यक्ति
    मन भायी

    सपनो को मैंने समझा है सपने हैं सपनों के दुश्मन
    पर मन मेरा नही समझता सपने देखत रहता क्षण क्षण

  3. Shruti Bhardwaj says:

    Woww…a nice one…!!!

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