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समर्पण

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Hindi Poetry

रक्त-बिंदु मिल शरीर बनाया
पवन, पानी, अग्नि मिल जीआ
चार पदार्थ ले इस जग में आया
फिर किस अमीरी का गुमान किया?

किस भ्रम-जाल में तू जी रहा
क्यों भोग-विलास में है डूबा
सुखसाधन के नशे में उन्मुक्त
सब देनहार को ही भूल रहा?

गुमान कर रहा उस माटी का
जो माटी ही बन जायेगी,
यादों की दे पोटली बना
जो सबके पास रह जायेगी|

हंसी बिखेर, दे दर्द भुला,
पोंछ दे आंसू, हो बेपरवाह,
खुशीआं फैलेंगी बेपनाह
जब निराश्रय को देगा पनाह|

हाथ अपना रख एक दरिद्र पर
फूल बरसेंगे अनेक आशीष बन
दे जीवन को कुछ मतलब आज
समर्पित हो जा हो निःस्वार्थ|

3 Comments

  1. SN says:

    aaj kee mahti aavashyakata.

  2. Vishvnand says:

    अति अर्थपूर्ण गहन ये बात
    याद न रखते हम और आप
    “समर्पित हो जा हो निःस्वार्थ |”
    सफल जीवन का जो मूलार्थ

    बहुत सुन्दर रचना
    hearty commends

  3. parminder says:

    Thank you for your kind appreciation Sidh ji and Vishwa ji.

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