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उम्मीद की बाज़ी

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Hindi Poetry
उम्मीद की बाज़ी

गलती  कभी की ही  नहीं ,फिर भी दादी  बेटे पोतों  से डरती रही
बच्चों का घर बना रहे ये सोचके ,हर जुल्मो सितम वो सहती रही
पोती-पोते जिस दादी ने  हर दिन खिलाये
अफ़सोस   पोते  उसे समझ ना  पाए
बेटों  ने फेरी तोते सी आँखें
प्यार-ओ-ममता की तोड़ दी पांखें
दादी निकल गयी लड़ के  जब  घर से,
पोते और बेटों ने ना बुलाया उन्हें फिर से
दादी फिर पहुंची अपनी   बेटी के घर
बोले जवाईं रहो तुम यहाँ ,है  काहे का  डर
मुझे मानो बेटा रहो चैन से
रोको बहते आंसू अपने नैन से
होगा मलाल ,बेटे   पोतों को जब
लेने आयेंगे दादी माता को तब
हुवा इंतजार कई महीने तक दीद के
टूट गए सपने जो पाले उम्मीद के
हुवे कैसे निष्ठुर जो थे भोले भाले
खिलाये थे जिनको प्रेम से निवाले
कभी तो खून रंग लायेगा
जब बेटा रूठी माँ को मनायेगा
इसी सोच में बैठी बुढिया रोज दरवाजा निहारती है
उम्मीद की बाज़ी खेलती है ,पर ,रोजाना हारती है

4 Comments

  1. siddha nath singh says:

    मुझे एक प्रसिद्द रचना जिसके कवी का नाम अभी याद नहीं आ रहा ,याद आ गयी-
    धीरे धीरे माँ हुई कोने का सामान,
    चला कहीं जाये नहीं मेहमानों का ध्यान,
    बड़का दिल्ली जा बसा मंझला दूजे देस,
    दीपक धर माँ थान पर मांगे कुसल हमेश,

    खटिया तक महदूद है अम्मा का संसार,
    व्यर्थ सभी संचार हैं तार और बेतार.

  2. dr.o.p.billore says:

    लाड़ लड़ाया खूब लुटाई ममता जिन पर |
    भारी पड़ गया एक बुढ़ापा माँ का उन पर ||
    बहुत उत्तम रचना ,बधाई |

  3. rajendra sharma "vivek" says:

    Jinko ham khoob jhoolo me jhulaate hai
    budhaape ki laathi nahi huye ve rulaate hai

  4. parminder says:

    भरपूर दर्द पर यथार्थ! काश इश्वर सबको सत्बुद्धि दे!

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