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dost

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एक मोड़ था जीवन के सफ़र में,
उस मोड़ पर तुम भी खड़े थे .
उस्ताद थे हम बहुत ,
उस्ताद तुम भी बड़े थे.
जब आयी मौज पर सवार कश्ती साहिल पर ,
बन हमसफ़र उस कश्ती पर.
हम भी चढ़े थे ,
उतर गए किनारों पर अपने अपने ,
दोस्त वो जो दिल के करीब बड़े थे .
खींचते है आज भी मुझे वो ,
जो तुमसे तार दिल के जुड़े थे.
साथ तुमको ही पाया मैंने अपने,
देखने जब हर बार हम पीछे मुड़े थे.
दुआओं में हमेशा माँगा फिर से साथ तुम्हारा,
दुआओं में जब भी हाथ मेरे उठे थे

2 Comments

  1. s.n.singh says:

    achchhi lagi.

  2. parminder says:

    वाह, रचना खूबसूरत लगी|

    \

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