« »

तना तराश के जिसको शहर ने मारा था

0 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 5
Loading...
Uncategorized

 तना तराश के जिसको शहर ने मारा था 

उसी शजर पे बना आशियाँ हमारा था।  शजर-पेड़

 

तमाम उम्र रहा खेलता मैं बिन सोचे 

कि दांव कौन था  जीता औ’कौन हारा  था। 

 

सफ़र पे आये निकल जिसके थे भरोसे हम,

पता नहीं था कि  वो डूबता सितारा था।

 

उसी पे आके हुईं गर्क़  किश्तियाँ कितनी,

कि  रहबरों ने बताया जिसे किनारा था। गर्क-डूबना

 

वो जिसको मान के बैठे थे सख्त पत्थर हम,

खुला ये राज़ वो अन्दर से मोम  सारा था।

 

वो होशियार था ताजिर तिजारते दिल का,

नफ़ा तमाम था उसका मेरा खसारा था।खसारा-हानि,नफ़ा-लाभ 

 

उसी के साथ शहर दर शहर चले आखिर,

न एक नज़र भी जिसे देखना गवारा था।

 

वो जिससे हम थे रहे सारी रात खौफ़ज़दा ,

खुली जो धूप  ,तो पाया, महज़ गुबारा था।

 

सितम तो देख, रही आँख मुन्तजिर जिसकी,

वो आया कल, तो लिए गैर का सहारा था।

 

वरक वरक पे, खुली जब किताबे दिल, देखा-

तेरे सितम का रक़म सिर्फ गोशवारा था।   वरक़ -पृष्ठ,गोषवारा-हिसाब,balancesheet 

 

वो आबशार था हुस्नो जमाल का जैसे 

हरेक नज़र के लिए दीदनीं  नज़ारा था। आबशार-झरना  दीदनीं -देखने योग्य

 

 

Leave a Reply