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ख़्वाबों की माला

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Hindi Poetry

ज़िंदगी मानों थम सी गयी है
हलचल नाम को भी नहीं है
सुबह में शाम की धुन्धालाहट है
रात पर तो वैसे भी अँधेरे की परत है।

सितारे ढूँढने निकलती हूँ हर रात अँधेरे में
मुठ्ठी में बंद कर मुस्कुराती आती हूँ
पुल्कित मन से जब हाथ खोल देखती हूँ
टूटे सपनों सा खाली हाथ ही पाती हूँ।

सहेज-सहेज लगातार ह्रदय के हर कोने में सजाती हूँ
बेबाक मुस्कुराहट से खुशबूदार फूलों की मानिंद सँवारती हूँ
पर यह छली सपने, दिखते हैं, शून्य में विलीन हो जाते हैं ,
और फिर उन्हें सहेजकर ख़्वाबों की माला में पिरोने लग जाती हूँ।

3 Comments

  1. Vishvnand says:

    Vishay par ati sundar anubhuti aur abhivyakti
    bahut man bhaayii
    Is sundar rachana ke liye hardik badhaaii

    • parminder says:

      Thanks a lot for the heartening words sir.
      Why can’t I see the poem on the site? I reached here through my mail.

  2. SN says:

    khubsurat andaaz. vah geet yaad aaya-sapne to sapne,kab hue apne,aankh khuli aur toot gaye.

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