« »

आज भी सबके लबों पर प्यास का आख्यान है।

3 votes, average: 3.67 out of 53 votes, average: 3.67 out of 53 votes, average: 3.67 out of 53 votes, average: 3.67 out of 53 votes, average: 3.67 out of 5
Loading...
Anthology 2013 Entries, Hindi Poetry

आज भी सबके लबों पर प्यास का आख्यान है।

आप को फुर्सत न देता आप का जलपान है।

 

पेड़ शर्मिन्दा रहा हो देख कर अपनी जड़ें,

हिन्द को hind ( हाइण्ड ) छोड़ा ,खूब हिंदुस्तान है।

 

जानवर ज्यादा तवक़्क़ो के हुए हक़दार अब,

फिक्र है इंसान की कम,आदमी हैरान है।

 

भेजते वापस विधाता को है कन्या कोख से,

मानते हर दान से महनीय कन्यादान है।

 

उस महल में मुद्दतों अपनी न सुनवाई हुई,

जिसमे कहते थे सभी दीवार के भी कान हैं।

 

मेजबानों  में ज़बानों पर न अपनी इत्तेफ़ाक़,

घर का मालिक़ बन गया वो जो  महज मेहमान है।

4 Comments

  1. rajendra sharma 'vivek' says:

    bahut sundar hindi ki gazal hai
    meethaa madhur raspaan hai

  2. Vishvnand says:

    vaah vaah arthpoorn badhiyaa aur maarmik

    Malik bane mehmaan miljul karen apanii susanskrati ka apmaan
    chune mantri hii bhrsht chaploos bigaaden desh kii shan hain

Leave a Reply