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***तुम्हारे बाहुपाश के लिए …….***

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Anthology 2013 Entries, Uncategorized
तुम्हारे बाहुपाश के लिए …….

कितने

वज्र हृदय हो तुम

इक बार भी तुमने
मुड़कर नहीं देखा
तुम्हारी एक कंकरी ने
शांत झील में
वेदना की
कितनी लहरें बना दी
और तुम इसे एक खेल समझ
होठों पर
हल्की सी मुस्कान के साथ
मेरे हाथों को
अपने हाथों से
थपथपाते हुए
फिर आने का आश्वासन देकर
मुझे
किसी गहरी खाई सा
तनहा छोड़कर
कोहरे में
स्वप्न से खो गए
और मैं
तुम्हें जाते हुए
यूँ निहारती रही
मानो
रूह जिस्म से
दगा कर गयी
किसी आशंका के चलते
मैं
पतझड़ में
वृक्ष से गिरे टूटे पीले पत्ते
की मानिंद
हवाओं के रहमो करम पर
टुकड़े टुकड़े बिखरने को रह गयी
उस झील को इक बार तो
मुड़कर देखते
उसके सीने पर
बेरहम वार से आहात
दर्द कितनी देर तक
लहरों में तैरता रहा
और उसमे
झिलमल करता
तुम्हारा शशांक
लहरों के साथ
दर्दीली छवि लिए
तुम्हारे
बाहुपाश के लिए मचलता रहा, मचलता रहा  …………….
सुशील सरना 1 3 .0 4 .2 0 1 3

4 Comments

  1. Mahender Singh Nayak says:

    sunder rachana.

  2. Alok Dubey says:

    Impressive . Sushil even I wish to post my poems on this site . Please advise how do I go about it .
    Regards
    Alok dubey
    My e mail ID IS drdubey@yahoo.com.

    • sushil sarna says:

      Thanks a lot Alok Dubey jee for ur so sweet appreciation. It is very easy to post the poem on this site. First of all u go to google.com/transliterate site and type the poem, copy the poem and paste the same here in the new post section.I this u have under stood my point.

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